स्कूल्स इंडिया कप करेगा हर बच्चे का सपना पूरा

झारखंड के स्टील सीटी ‘बोकारो’ में बचपन से बड़े होने के सफर में मैंने कभी नहीं सोचा था कि स्पोर्ट्स कभी मेरा जीवनवयापन का जरिया बन जाएगा। स्कूल के दिनों में  मैंने कभी किसी स्कूल स्पोर्ट्स में भाग नहीं लिया और ना ही कभी शॉट-पुट में अपने हाथ आजमाए जो कि मेरा पसंदीदा खेल था। मैंने खुद के लिए ये धारणा बना ली थी कि मैं अपने देश के लिए (चाहे वो राज्य स्तर पर हो या राष्ट्रीय स्तर) खेल के क्षेत्र में कुछ ऐसा नहीं कर सकती जिससे देश मुझपर गौरवांवित हो। शायद यही कारण था कि खेल को लेकर मेरे अंदर के जुनून और उत्साह ने दम तोड़ दिया।

इसके कुछ साल बाद जब मैंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से अपनी ग्रैजुएशन खत्म की और फिर दिल्ली के भारतीय विद्या भवन में पोस्ट ग्रैजुएशन करते वक्त जर्नलिज्म को अपनी पसंद बनाई तब भी मैं ये नहीं जानती थी कि स्पोर्ट्स के लिए मेरे अंदर इतना जुनून है कि मैं इसे अपना जीवनवयापन का जरिया बना लुंगी। दिल्ली में जर्नलिज्म की पढ़ाई का चुनाव करने के बाद खुद को स्थापित करने की कड़ी में जब भी किसी को मेरे बारे में जानकारी होती कि मैं झारखंड के एक जिले से संबंध रखती हूं तो अकसर उनके तरफ से यही सुनने को मिलता है कि मैं एक ऐसे राज्य की बेटी हूं जहां खेलों को पूजा जाता है फिर चाहे बात हॉकी की हो, क्रिकेट, तीरंदाजी, फुटबॉल या विभिन्न एथलेटिक्स की।

मौजूदा समय में जब मैं एक स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट रह चुकी हूं, साथ ही स्कूल्स स्पोर्ट्स प्रमोशन फाउंडेशन में बतौर असिसटेंट स्पोर्ट्स ऑफिसर के पद पर कार्यरत हूं, तो अब मेरा झारखंड राज्य खेल के क्षेत्र में एक ऐसे एतिहासिक आयोजन का हिस्सा बनने की ओर अग्रसर है जिसमें हर छोटे से छोटे गांव और शहरों में युवा प्रतिभाओं को खुद को खेल के क्षेत्र में तराशने का मौका मिलेगा। इस कड़ी में 23 मई को रांची के हीनू स्थित इंप्रेशन स्पोर्ट्स हाउस में सुबह 11 बजे एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। यह वहीं जगह है जहां से बचपन में गुजरते वक्त मैं सोचा करती थी कि काश मुझे भी मौका मिला होता तो शायद मैं भी खेल में कुछ अच्छा कर पाती। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में एशियन गेम्स में वालीबॉल के सिल्वर मेडलिस्ट जयदीप सरकार और झारखंड फुटबॉल एसोसिएशन के सचिव श्री गुलाम रब्बानी भी मौजूद रहे।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि झारखंड एक ऐसा राज्य है जिसने देश को कई खिलाड़ी दिए हैं। फिर चाहे बात जयपाल सिंह जैसे दिग्गज ओलंपियन की करें जो 1928 ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम के कप्तान थे या फिर क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी की करें जिन्होंने भारत को वर्ल्ड चैम्पियन बनाया, तीरंदाजी में दीपिका कुमारी की करें या बास्केटबॉल, वालीबॉल, फुटबॉल की करें जिसमें झारखंड के खिलाड़ियों ने हर खेल में अपनी पैठ बनाई है। अपनी सोच को कागज कलम के जरिए आप तक पहुंचाते वक्त झारखंड की वो बेटी वंदना यहीं सोच रही थी कि काश उसके समय में भी स्कूल स्पोर्ट्स प्रोमोशन फाउंडेशन जैसी किसी पहल को अंजाम दिया गया होता तो शायद वह भी स्पोर्ट्स में देश के लिए एक खिलाड़ी के रूप में कुछ कर पाती। हालांकि इन सबके बावजूद मुझे खुशी है कि मौजूदा समय में झारखंड राज्य के साथ साथ हर राज्य के छोटे छोटे गांव में हर स्कूल को इस मंच के जरिए युवा खिलाड़ियों को तराशने का मौका मिलेगा।

यहां पढ़ें कुमारी वंदना का ब्लॉग झारखंड के स्पोर्ट्स कल्चर पर, जो स्कूल स्पोर्ट्स प्रमोशन फाउंडेशन में बतौर असिसटेंट स्पोर्ट्स ऑफिसर के पद पर कार्यरत हैं। वंदना का संबंध झारखंड राज्य से जो खेल पत्रकारिता से जुड़ी रही है और सभी खेलों को अच्छे से समझती हैं। झारखंड एक ऐसा राज्य है जहां पर खेलों को सुनहरा इतिहास रहा है औप भविष्य उज्जवल है जिसको लेकर वंदना सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ रहीं है।

 

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